कवि लेखक के हिय कानन की,
मकरंद सुगंध बिखराने को.
संचेतना संगम भ्रमर उड़ चला,
अधखिली कली खिलाने को.
विचारों के उमड़ते सघन घन से,
भाव बूंद बूंद बरसाने को.
मानस मन संगम को चेतन की,
साहित्य सुधा पिलाने को.
एक लखा समूह हो पाठक का,
छूए शिखर सोपानों को.
संपादक जी को है बधाई तथा,
पत्रिका के घने घराने को.
मुकेश मित्तल शशि