आने वाला है सावन, मेघों की पायल छनक रही है,
धरती की गोदी में हरियाली फिर से चहक रही है।
मन के सूखे आँगन में फिर उम्मीदें उग आई हैं,
संग बूँदों के कान्हा की बाँसुरी भी लहराई है।
अंबर नीला, घटा घनेरी, खेतों में रस बरसे,
किसान की आँखों में सपने फिर से नाचें हर्षे।
नदियाँ झूमीं, पोखर बोले, झूले लगे पीपल पर,
सावन फिर लौटा है जैसे माँ की ममता घर-घर।
महक उठी हैं गलियाँ-बगियाँ, रिमझिम राग सुनाती हैं,
बहनें राखी बाँधने को थाली सजा सजाती हैं।
शिवालयों में गूंज उठी है ओम् नमः शिवाय की गूँज,
शिवभक्तों की भक्ति से भर गया है सातों ध्रुव–सूँज।
मटकी फोड़े नटखट कान्हा, ग्वालों संग लीला रचाए,
सावन की रासलीला देखो, प्रेम सुधा फिर बह जाए।
मेरे देश की मिट्टी बोले — “अब पीड़ा मत सहना”,
हर सावन इक संदेश है — “हरियाली बन तू रहना।”
विजय कुमार शर्मा
प्रधान संपादक – संस्कार न्यूज़
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