ज़रा सी तबीयत क्या नासाज़ हुई——-बच्चे वकील बुला लाए हक़ीम से पहले——शायद हम ही नहीं दे पाये इन्हें अच्छी नसीहत !!
सच कहो तो आजकल की दुनिया में अहम है बस एक शह , वो है “वसीयत” !!!
किसी ने हाल नहीं पूछा, किसी ने हाथ नहीं थामा, बस सब चाहते थे हमारे दस्तख़त ।
अकेलापन तो पहले से ही बहुत था, सब को इकट्ठा देख, यकीनन हुई हैरानगी——यही है आजकल की औलाद।
चलो, क्या करें , माँ बाप तो फिर भी इनको देते हैं आशीर्वाद।
ये खुश रहें, हँसते खेलते रहें, यही उस परमेश्वर से करते हैं हम फ़रियाद।
लेकिन देख इनका रव्वैया, मन यकीनन हुआ विचलित, आँखें भी हो गईं नम।
चलो, हमारे इस दुनिया से जाने का किसी को ना होगा गम।
अपनी साथिन को तो हम पहले ही गवाँ चुके हैं, तो अब हमारी मौत पर कोई भी ना आँसू बहायेगा।
औलाद तो मंद मंद मुस्कुराएगी, उनके हाथों में जब वसीयत का काग़ज़ आ जाएगा।
बहुत सालों से जी रहें हैं अकेले, कोई भी नहीं पूछने आता था हाल, ना बेटा, ना बेटी , यही कहता थे कि है मसरूफ़ियत।
शायद सब के साथ ऐसा नहीं होता है, शायद हम ही हैं बदकिस्मत।
आज फिर से अपने पुराने कर्मों पर करने लगें है भरोसा———क्यूंकि अपनों से भी मिला है महज़ धोखा।
सच बताना , क्या आपका भी ऐसा ही है अनुभव, इस कलयुग में सब कुछ है संभव ।
चलो, आख़िरी वक्त हमारे दस्तख़त करने पर, हमारी संतान के होंठों पर तो आ गई हँसी , हमें इसी बात की है ख़ुशी !!!
और वैसे भी ये अकेलापन , थी परेशानी ही परेशानी——किस को चाहिए ऐसी ज़िन्दगी, ऐसी रंजिशों से भरी ज़िंदगानी ???
खैर, वक़ील के आने पर हमने भी फ़ौरन कर दिए दस्तख़त, और हो गए मौन ———बात करें तो किस से करें , सुनने वाला है कौन ???
उम्मीद करते हैं कि हमारी अर्थी को तो मिल जाएँगे कंधे चार——क्यूंकि औलाद चाहे पीछे हट जाये, लेकिन हैं मौजूद कुछ दोस्त यार !!!!
कवि——नीरेन कुमार सचदेवा।
I literally broke down while writing these few lines, but this is the “ harsh reality “ of our so called “Modern world “
