शुभ वीरवार, आपका दिन मंगलमय हो।

पत्नी में वो शक्ति होती है, जिसके घूरने से ही लौकी की सब्ज़ी में पनीर का स्वाद आने लगता है ।
और पत्नी के महज़ ये शब्द , “कहाँ हो तुम” , ये सुन दिल घबराने लगता है !
यक़ीन मानना , कौन सी सब्ज़ी का कैसा है ज़ायक़ा , ये पहले से ही होता है निर्धारित ।
पति को पत्नी के सामने बात करने की आज़ादी भी होती है सीमित ।
कहना ही पड़ता है , क्या ज़ायक़ा है , है मसालेदार , कितना अच्छा तुमने बनाया है अचार ।
और ख़ुदा ना ख़ास्ता , अगर नमक कम है , तो थोड़ा नमक और डाल लूँ , इतनी नहीं मुझ में है हिम्मत !
अगर ऐसा किया तो आ जाएगी शामत !!
फ़ौरन lecture बाज़ी शुरू हो जाएगी , टेढ़ा मुँह बना कर बोलेगी , हर चीज़ में नुक़्स निकालने की तुम्हें पड़ चुकी है गंदी आदत ।
इतने भारी भरकम अल्फ़ाज़ सुनने की पड़ चुकी है अब आदत , क्या ये “मर्द” जात ही है बदकिस्मत ?
क्या बताऊँ , ज़िंदगी चल रही है ख़ुशनुमा क्यूँकि हमेशा मिलाता रहता हूँ उसकी हाँ में हाँ।
पति तो मानो जैसे हो कोई Robot , करता रहता है हुक्म की अदाएगी , ऐसी ही कटती है मर्दों की ज़िंदगी।
शक की इंतेहा तो तब हो गयी जब एक दिन मेरी क़मीज़ पर उसे एक बाल मिल गया !
मेरा तो उस दिन पूरा जहान ही हिल गया !!
सवालों पे सवाल , किस कलमुही के साथ गुलछर्रे उड़ा रहे हो ?
कहाँ कहाँ उसे घूमने ले कर जा रहे हो ??
बेफ़िज़ूल था शक , क्या दूँ मैं सफ़ाई , उस दिन तो मेरी जान पर थी बन आयी ।
कोई चारा नहीं था , अनेकों ग्रंथों पर हाथ रख कर खाई क़समें , कहा शादी की हमेशा निभाऊँगा मैं सारी रस्में ।
हाथ जोड़े , माफ़ी माँगी , कहा ना करूँगा तुमसे बेवफ़ाई , मेरे मौला मेरे दुश्मन को भी ना मिले ऐसी लुगाई !!!!!
कवि——-नीरेंन कुमार सचदेवा।

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