
शीर्षक——बहुत अजीब है ये आधुनिक दुनिया——
सच में ये नादान भी बेमिसाल हैं, दिलों में अँधेरा है और दीपक मंदिरों में जलाते हैं ।
दिलों में द्वेष भरा हुआ है , लेकिन है आपस में अत्यधिक लगाव , ऐसा जताते हैं ।
ज़िंदगी में हमें सावधान रहना चाहिए , ये सब वाक्यात हमें यही समझाते हैं ।
शायद एक सच्चा आशिक़ , कम से कम बहरूपिया तो नहीं है , जो दिल में है वोही होंठों पर है , प्रेमी जोड़े इसीलिए अक्सर इश्क़ ओ मोहब्बत भरे गीत गुनगुनाते हैं ।
ख़ैर ,माँ बाप की जात ही कुछ और है , कितना प्रेम वो अपनी औलाद पर बरसाते हैं।
ये रईसी , ये शान ओ शौक़त , सब कुछ यही रह जाना है , और ये मूर्ख लोग इस पर इतराते हैं ।
लेकिन सब को एक ही खूँटे से तो नहीं बाँध सकते , कुछ उत्तम लोग आज भी बख़ूबी रिश्ते नाते निभाते हैं ।
मुझे तो circus के जोकर बहुत अच्छे लगते हैं , कम से कम वो अपनी अदाओं से इस दुनिया को हँसाते हैं ।
किसी ज़माने पराए भी अपनों जैसे होते थे , अब अपने भी हैं परायों जैसे , ये सोच हम बौखलाते हैं !
वो पुराने ज़माने ही अच्छे थे , जब दिलों में इंसानियत का नूर उजागर था , वो क़िस्से बड़े बूढ़े हमें अक्सर सुनाते हैं ।
पुराने ज़माने में अहसासे अदब और तहज़ीब कुछ इस तरह बुलंद थे , कि नए नवेले दुल्हा दुल्हन भी कभी कभी एक दूसरे से शर्माते थे।
जब सारा परिवार एकजुट होकर रहता था , तो घर बच्चों की गूँजती किलकारियों से महक जाते थे ।
आजकल तो माँ बाप भी बोझ लगने लगते हैं , आजकल के बच्चे ऐसी हैवानियत दर्शाते हैं ।
विडम्बना ये है कि वृद्धाश्रम में , शायद साल में एक बार भी अगर कोई बेटा अपने माँ बाप से मिलने जाता है , तो वो आज भी उसे प्रेम भाव से गले लगते हैं ।
मालिक मेरे , क्या अब भी इस कायनात में बदलाव सम्भव है , क्या अब भी दिलों में उजाले छा सकते हैं ?
कवि———निरेन कुमार सचदेवा।