तुम रूह की आवाज़ बन जायो ,__ “कवि———निरेन कुमार सचदेवा।”

तुम रूह की आवाज़ बन जायो , मैं ख़ामोशियों की मधुर तान ।

इस से ख़ूबसूरत क्या होगी , इश्क़ ओ मोहब्बत की दास्तान ।

तुम मेरी ज़िंदगी की कहानी का राज़ बन जाओ , लेकिन इलतजा है मेरी कि इस राज़ को अपने तक ही सीमित रखना, क्यूँकि सिर्फ़ तुम्हारे प्यार का स्वाद मुझे है चखना ।

उड़ा ले जायो मुझे सातवें आसमान पर , मेरे परवाज़ बन जायो, ले चलो मुझे वहाँ , सितारों से आगे है जो जहान ।

इजाज़त दो मुझे तो मैं तुम्हारी परछाईं बन

जाऊँ , फिर तुम्हारे साथ चौबीसों घंटे रह पाऊँ , और फिर किसी को भी नहीं होगा शक, तुम पर है तो बस मेरा ही हक़ ।

यूँ भिगा दो मुझे प्रेम प्रीत की फुहारों में , ऐसे साज़ बजाओ कि मेरा अंग अंग भीग जाए प्रेम रस में , कर लो मुझे पूरी तरह से अपने बस में ।

सिर्फ़ रूह की नहीं, तुम मेरे ज़मीर की भी आवाज़ हो , तृप्त कर दिया है जिसने मेरे तन मन , उस प्रेम की आग़ाज़ हो ।

अगर तुम वीणा हो तो मैं हूँ ताल , अगर तुम लौ हो तो मैं हूँ मशाल , निखर गया हूँ तब से , जब से तुमने अपनी नज़र मुझ पर दी थी डाल ।

मैं ख़ामोशियों की मधुर तान हूँ , अगर तुम गीता हो तो मैं हूँ ज्ञान , तुम मेरे लिए हो , प्रभु का भेजा हुआ वरदान ।

ऐसी ख़ूबसूरती से गुनगुनाई है तुमने इश्क़ ओ मोहब्बत की दास्तान , कि आशिक़ बन गया है ये मामूली सा तुच्छ इंसान ।

तुम क्या मिली , दिल में खिल गया है एक रंगीन कमल , और अब मन भी हो गया अस्थिर , हो गया है बहुत चंचल ।

आरजुओं पर नहीं है क़ाबू , है तड़पनें ही तड़पनें , बेक़ाबू हो रहीं हैं अब दिल की धड़कनें ।

जानेमन , कब तक रहेगा ये फाँसला , कब तक करना पड़ेगा हमें हौंसला ?

बेक़रारी है , बेज़ारी है , अब और नहीं होता इनतज़ार , तुम आ जाओ , तभी दिल को मिलेगा क़रार !

कवि———निरेन कुमार सचदेवा।

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