अजमेर का स्वस्तिक नगर पाँच दिन से पानी में तड़प रहा है। घरों के आँगन तालाब बने, रसोईघर कब्रिस्तान बन गए, मासूम बच्चे दूध की बूँद को तरसते रहे और बुज़ुर्ग दवाइयों के बिना दर्द से कराहते रहे। लेकिन सत्ता का बंगला दो किलोमीटर दूर सुरक्षित खड़ा रहा, माननीय महोदय अपनी सूखी कुर्सी पर आराम से बैठे रहे।
जनता चीखती रही – “बचाओ! बचाओ!”
लेकिन सत्ता का दरबार गूँगा बना रहा।
माननीय का बंगला तैरता रहा संवेदनहीनता की लहरों में,
और जनता डूबती रही अपनी ही बदहाली की गहराइयों में।
फिर अचानक शनिवार 6 सितंबर को जैसे कोई जादूगर अजमेर आया। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत स्वस्तिक नगर पहुँचे। और देखिए चमत्कार!
माननीय की आँखें खुलीं, हृदय में करुणा जागी, और घोषणाओं की बाढ़ बह निकली —
एक माह का वेतन देंगे,
विवेकाधीन कोटे से सहायता देंगे,
भामाशाहों से मदद दिलाएँगे।
वाह! क्या यह जनता की सेवा है या राजनीति की नाटकबाज़ी?
पाँच दिन तक जनता डूबती रही, लेकिन जैसे ही विपक्षी नेता पहुँचे, माननीय की संवेदना का बाँध टूट पड़ा।
सवाल है —
क्या जनता के आँसू अब कैमरे और विपक्ष के साथ ही दिखते हैं?
क्या प्रतिनिधियों की ज़िम्मेदारी केवल घोषणाएँ करने तक सीमित रह गई है?
क्या पाँच दिन तक जल समाधि लेने के बाद जनता को केवल दिखावटी सांत्वना ही मिलेगी?
और हाँ, जिस एलिवेटेड रोड को महोदय ने “रामसेतु” का नाम दे रखा है, वहाँ अगर गहलोत जी टहल जाते तो उसी दिन विकास के ठेके बरस जाते। जनता डूबे या मरे, फर्क नहीं पड़ता, लेकिन राजनीतिक नाटक का पर्दा उठते ही सत्ता का मसीहा अवतरित हो जाता है।
स्वस्तिक नगर की यह त्रासदी हमें याद दिला रही है —
जनता डूब सकती है, पर सत्ता की कुर्सी कभी गीली नहीं होती।
जनता रो सकती है, पर सत्ता की घोषणाएँ हमेशा सूखी ताली बजाती हैं।
अब जनता का सब्र टूट चुका है।
यह है असली विजय नाद —
“अब खोखली घोषणाएँ नहीं चलेंगी।
जनता ही असली रामसेतु है,
जो समय आने पर सत्ता की कुर्सी को बहा ले जाएगी।”
विजय कुमार शर्मा
प्रधान संपादक – संस्कार न्यूज़
9610012000