
‘इन्द्रधन्वा-
दैवीय-रूपाभा
और
निर्दोष मुस्कानों की श्वेत-श्याम
रिमझिमी-बारिश
संगमरमरी पत्थरों सा
सदाबहार-काल्पनिक-
उठानी-यौवन
और
लम्ब-काया का
झूमता सागौन
हृदय-हीन भावना-रहित
मूर्तियों का मोह
और जन्म-जन्मांतर के
सम्बन्धों का एक-मात्र संस्कार’ …
जिन्दगी जला देती है…
हर एक हरियाली
मिटा देती है…
‘यह आसक्ति है’, जो
तिल-तिल कर के
एक दिन
गहरी-नींद
सुला देती है।
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🖍️ बृजेश आनन्द राय जौनपुर 6394806779
बहुत धन्यवाद रजनी जी!
प्रकाशित करने के लिए।!
सुधार के लिए धन्यवाद!