ढेरों स्वप्न सुनहरे देकर, तुमने मेरी नींद चुरा ली।
रात-रात भर जग कर मैं अब, करता हूँ इनकी रखवाली।।
चतुर सयानी, चपल तुम्हारी, बड़ी-बड़ी आँखें कुछ बोलीं।
मेरी इन भोली आँखों ने, उन आँखों से आस लगा ली।।
किया देखकर भी अनदेखा, हँसता हुआ फूल मुरझाया।
मन की हर मृदु बात आज की, हँसकर तुमने कल पर टाली।
कब से लगी टकटकी लेकिन, कोई उत्तर नहीं उधर से।
“नहीं मिलेंगे इन आँखों से”, उन आँखों ने शपथ उठा ली।।
बाँछें खिली-खिली रहती थीं, था गोरा-गोरा-सा मन यह।
दुख की कड़ी धूप में तपकर, त्वचा पड़ गई इसकी काली।।
दोष नहीं है ऋतु का कोई, दोष तुम्हारी अनदेखी का।
काँटों-भरी दिख रही है जो, लदी हुई फूलों की डाली।।
है आवाज न गोली कोई, पर मारक-क्षमता अचूक है।
अद्भुत है दो आँखों वाली, कैसी यह बंदूक दुनाली!!
—डाॅ०अनिल गहलौत
