बचपन से शहर में पली-बढ़ी प्रिया को जब भूमि ने अपने गांव होली में चलने को कहा तो उसकी बांछें खिल गई।होली के दिन पूरा गांव एक अलग ही रंग में रमा था। आपसी सौहार्द ,भाईचारा और प्रेम से सराबोर माहौल प्रिया को आकर्षित कर रहा था। अब बारी थी घर -घर जाकर होली खेलने और पुआ-पूरी खाने की।भूमि प्रिया और उसकी सहेलियां सभी घर-घर जाकर और घूम-घूम कर होली का भरपूर आनंद ले रहे होते हैं। तभी उन्होंने सुना सीमा की मां किसी को जोर- जोर से डांट रही होती हैं।
रामू की मां रामू से कहती है, 'बेटा आज जेष्ठ शुक्ल पक्ष की गंगा दशमी तिथि है।मुझे गंगा स्नान करा दो तो बड़ा उपकार होगा। मुझे मोक्ष की प्राप्ति हो जाएगी। मैं मुक्त हो जाऊंगी।तूने मेरे लिए बहुत किया है। ले चल बेटा।'
रामू आज्ञाकारी पुत्र था।वह अपनी मां को ले गंगा स्नान को चल देता है। वहां भव्य मेले और यज्ञ का आयोजन किया गया है।मंत्री,विधायक सहित सभी बड़े पदाधिकारी वहां मंचन कर रहे हैं।पर्यावरण पर किए गए अपने -अपने कार्यों की सभी बढ़ा चढ़ाकर प्रस्तुति दे रहे हैं।
सीमा की उम्र अभी 18 वर्ष से भी कम थी।फिर भी लड़के वालों की पसंद होने और लड़के के शहर में अच्छे पद पर होने के कारण उसकी शादी कर दी गई। सीमा फूलों से सजी सेज पर पति का इंतजार कर रही होती है। तभी शराब में धुत उसका पति आता है।
टूटता रहा बदन उसने उफ़ तलक न की,,
उसकी रगो में बहता था ईमानदारी का लहू,,
दो जून की रोटी बस उसकी ख्वाइश थी,,
वो गुलाब भी बन सकता था मगर बना केवल गेहूं,,
जितनी सिद्दत से रूठी महबूबा को मनाने को महंगे उपहार लाते हो,,
उससे आधी सिद्दत से भी अगर
एक भी फुटपाथ पे सोनेवालों के लिय छत बनाओ,,,
तो नवनिर्माण संभव है,,,