रेगन जल की चाह में, दौड़े प्यासी हिरणि। वैसे ही प्रिय-संग में, तड़पे मेरी किरनि।। आँखों में छवि बसी, छूते ही हो विलुप्त। मृगतृष्णा-सा प्रेम है, गहन, अनंत, अनुपम।। अधरों की प्यास रहे, मिलन न पाए साथ। हर पल बढ़ती चाह यह, देती नव सौगात।। स्वप्न-नयन में देखता, तेरा मधुर विहान। जागते ही ओझल हुआ, छूटा तेरा गान।। प्रिय-स्मृति शीतल लगे, ज्यों हो चाँद उजास। पर मिलन की तृष्णा में, जलता हर श्वास।। मन के आँगन खिले, तेरे रूप-सुगंध। पर मृगतृष्णा-सा लगे, अधूरा हर छंद।। विरहा अग्नि जलाए, आशा करती नृत्य। मृगतृष्णा-सी छवि तेरा, जगाती अनृत्य।। प्रेम-प्यास बुझती नहीं, हर पल होती गाढ़। मृगतृष्णा-सी छवि तेरी, जीवन की आधार।। स्वरचित एवं भावपूर्ण (998) मुकेश "कविवर केशव" सुरेश रूनवाल

“मृगतृष्णा”

जिंदगी

तोड़ कारा कंदराओं की रौशनी का दीदार कर ले संकीर्ण मनोभावों से हो मुक्त जीवन का विस्तार कर…

बरसात

जो दिल से दिल की,बात ना होती शायद यूं झूमकर,बरसात ना होती यों दिल का दिल से,दिल ना…