निश्छल प्रेम

प्रेम अगर पाषाण हृदय से
किया जाए तो व्यर्थ हो जाता है
ठीक वैसे ही जैसे
बंजर भूमि में बीच के दाने
सर और गल जाते हैं ,,

जिसे फर्क ही न पड़ता हो
तुम्हारी पसंद ना पसंद से
जिसे समझ ना आता हो
तुम्हारे मौन के पीछे की पीड़ा
और जो बड़ा नहीं सकता
अपने हाथ पोछने को
तुम्हारा अश्रु_जल ,,,

उसे आखिर कैसा प्रेम
क्यों करनी उसकी प्रतीक्षा
रात के तीसरे पहर तक
सर्द पूस की रात में
चौखट पर कांककपाते हुए
वीरान सुनी रात में पवन के
सायं_ सायं और पत्तों के
सर_सर आवाज से
घबराते हुए
और किरासन तेल से बार-बार
अंगीठी को सुलगाते हुए ,,,

यह जानते हुए भी कि उसे
एहसास नहीं तुम्हारे किसी भी
जतन का कोई मोल नहीं
तुम्हारे प्रेम का और
कोई इच्छा नहीं तुम्हारे साथ की ,,

फिर भी वह उठती है सवेरे
बनाती है घर को गुगुल से सुगंधित करती है अपने आराध्य से
तुम्हारे लंबी उम्र और तरक्की की कामना
बिसार कर अपना अपमान
पीकर अपने आंसू और
सहकार मन के घाव
करती है वह तुम्हारी सेवा और
बनाती है तुम्हें एक संपन्न पुरुष,,

क्योंकि नारी ही प्रकृति है और प्रकृति की प्रकृति है,
सजाने की,संवारने की, संजोने की,,,

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