बेइंतहा सुकून होता है
सावन की इन रिमझिम बूंदों में
मन मयूर बन संग इसके
भींगने को आतुर और
लालायित होता है
त्याग कर अपनी विरह_ वेदना
और खोकर अपना अस्तित्व ,,
स्वत: उपजने लगती है
सुकोमल भावनाएं अंतर्मन में
इन बूंदों की छुअन से
फिर ये अतरंगी मनोदशाएं
गहरी संवेदनाओं का स्वरूप
साध लेती हैं और
धीरे-धीरे पाषाण पुरुष भी
नन्ही कली समान खिल_
खिल जाता है ,,
इन शबनमी जादुई बूंदों में
धुलती जाती है उसकी बेचैनी
तड़प और असफलताएं
जीवन_ पर्यंत झेले गए
अवसादों की गिरफ्त अब
ढीली होती जाती है
इन बूंदों की नमी से,,
मुखमंडल पर एक तेज
व्याप्त होता चला जाता है
सुकून की रेखाएं मानसपटल
पर उभरने लगती हैं
हृदय में प्रेम उमड़ने लगता है
और हौले से निकल जाती है
एक सुरीली तान_
’जीना है तो हंस के जियो,
जीवन में एक पल भी रोना ना,,,,,,!