शुभ शुक्रवार,

राख की कई परतों के नीचे देखा , पर अफ़सोस , वो ग़ुरूर , वो ख़्वाब , वो पद , वो रुत्तबा, कहीं नज़र नहीं आया जो सारी उम्र हम ओढ़े बैठे थे।
जब सासें चल रहीं थीं कितना अभिमान था , कितने मगरूर थे हम , मैं हूँ सब से महान , येही बेकार सोच मन में रख , हम नासमझ हो कर कई अपनों से ही मुख मोड़े बैठे थे ।
कहाँ चला गया वो ग़ुरूर , वो सरूर , कहाँ है अब वो दौलत , वो शोहरत , वो सल्तनत , वो मलकियत , वो हैसियत , आख़िर में सब राख हो जाना है , मिट्टी मैं विलीन हो जाना है , यही है असलियत , ज़िंदगी की करूर हक़ीक़त !
यारों , दोस्तों , एक ना एक दिन इस जिस्म को , शरीर को , मिट्टी में मिल जाना है , ख़ाक हो जाना है , राख हो जाना है , सिर्फ़ वक़्त की बात है ।
पर ज़्यादातर इन्सान यह नहीं समझते , आज के आधुनिक ज़माने में , आज के modern इंसानों की ऐसी ही जात है ।
बहुत मूर्ख है इन्सान , तरस आता है इस की छोटी सोच पर , अरे नादान , जाग जा , कुछ अच्छे करम कर ।
अक्सर सुनने में आता है कि ख़ाली हाथ आए थे , ख़ाली हाथ जाना है , पर फिर भी इस बात को हम सब करते हैं नज़रंदाज ।
जब तक जीवित हैं , दिमाग़ सातवें आसमान पर उड़ता रहता है , ऐसे होते हैं हैं हमारे मिज़ाज ।
यह राख , यह मिट्टी , यही जीवन का आख़िरी पड़ाव है , जीते जी , अच्छी तरह से पवित्र पानी में बहा लो , यह जो जीवन रूपी नाँव है ।
मैं यह नहीं कहता कि अच्छी तरह से ना जियो , ज़िंदगी जीने के लिए है , ख़ूब खाओ पियो और ऐश करो ।
लेकिन जियो ज़मीन पर ही , अच्छाई करो , भलाई करो , चंद अच्छे काम करो , मरने के बाद भी कोई तुम्हें याद करे , ऐसा अपना नाम करो ।
राख और मिट्टी , आख़िरकर यही है जीवन का अर्थ , जीवन की वास्तविकता , इन से आज तक ना कोई बच सका है और ना है कोई बच सकता।
कवि——-निरेन कुमार सचदेवा ।

Comments

No comments yet. Why don’t you start the discussion?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *