कोई रूह का तलबगार हो तो हम भी मोहब्बत कर लें

कोई रूह का तलबगार हो तो हम भी मोहब्बत कर लें

कोई रूह का तलबगार हो तो हम भी मोहब्बत कर लें , यहाँ दिल तो बहुत मिलते हैं पर दिल से दिल नहीं मिलता ।
और सिर्फ़ दिलों का मिलन होने पर ही है शोला भड़कता और दिल का कमल है खिलता ।
हमें रूह का तलबगार चाहिए , आँखों से छलकता प्यार चाहिए , प्यार का इज़हार चाहिए , इकरार चाहिए ।
बेसब्री हो , बेचैनी हो , तड़पन हो महबूब से मिलने की , ऐसा इनतज़ार चाहिए ।
बहुत मतलबी हो गया है इंसान , धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है इंसानियत ।
सब कुछ नक़ली , बनावट ही बनावट , कहाँ खो गयी है असलियत ?
दिल के रिश्ते , प्यार मोहब्बत , अब बन गये हैं जैसे एक मज़ाक़ , एक खेल ।
कहाँ गए वो धड़कते दिल वो जज़्बात , वो दिल से दिल का मेल ।
बहुत बुरा लगता है , बहुत दुःख होता है , जब देखता हूँ कि अब खिलवाड़ बन गए हैं ये इश्क़ और मोहब्बत ।
बस ऐश की , घूमे फिरे , तमाम उम्र साथ निभाने की अब किसी को नहीं है हसरत ।
यह ठीक नहीं है , बहुत बहतर थे वो बीते ज़माने , जब दो प्रेमी एक अटूट बंधन में बँधते थे ,दिलों के रिश्ते पड़ते थे निभाने ।
या खुदा ,तू भी तो सब देख रहा है , ऐसा क्यूँ हो रहा है , तू ही इजात कर कोई तरकीब ।
फिर से ज़िंदा हो जुनून ऐ आशिक़ी , महबूब और महबूबा , आने वाली कई सदियों तक रहें एक दूजे के क़रीब ।
सच्चा प्यार हो ,पाक इश्क़ हो और हो मुकम्मल मोहब्बत , बहे जज़्बातों का सैलाब।
हवाओं में हो प्यार ,घटायों मैं हो इकरार , फ़िज़ाओं में हो इज़हार , इनकार की कोई गुंजाइश ही ना हो , एक ऐसे कायनात का ख़्वाब देखता हूँ मैं जनाब ।

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