सोच अपनी_अपनी

वह जेठ की भरी दोपहरी और वो
तपतपाती धूप जिसने
उबाल दिया था संपूर्ण धारा को
मानो सूर्य देव की भी
तीसरी आंख हो और
जिसके खुलते ही
भस्म होने लगे संपूर्ण चराचर जगत,,

फिर स्वयं के प्राण से बढ़कर
कोई अमूल्य वस्तु नहीं
यह बात प्रत्यक्ष प्रमाणित होती
दिख रही थी
बिना किसी अति आवश्यक
कार्य के घर की दहलीज लांघना
किसी को गवारा नहीं था,,,

तभी मेरे स्कूटी ने मुझे
धोखा दे दिया या यूं कहूं तो
वह इस खौलती दोपहरी को
बर्दाश्त ना कर सकी फिर
मैंने एक सरसरी निगाह डाली
अपने चारों ओर जिसमें संपूर्ण
शांति व्याप्त थी मातम समान,,

कोई भी ऑटो या रिक्शावाला
अपने आराम को हराम करने को राजी ना हुआ तभी एक अधेड़ आदमी अपना रिक्शा लेकर आया _”मैडम चलिए मैं लिवा चलता हूं ,,,,

अंधा क्या मांगे दो आंखें ,,,
तभी मेरा ध्यान उसके पांव पर गया जो बेबाईयों से फटा पड़ा था
चप्पल के अभाव में
मैंने पूछा आप इस धूप में
नंगे पांव क्यों हैं
मैम जी इस गर्मी छुट्टी के बाद न
मेरी बेटी स्कूल जाएगी
उसके लिए नया जूता त लेना ही होगा न
एही से चप्पल नहीं लिए,
हमारा का हमें तो आदत है,
वह तो फूल है ना जल जाएगी
उसे पढ़ा_ लिखा कर खुबे बड़का आदमी बनाना है
काहे से जो हम सहे है न
यू हमरी बच्ची न सहे
और उसके इस उत्तर ने
मुझे बौना कर दिया ,,,,

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