तोड़ कारा
कंदराओं की
रौशनी का दीदार
कर ले
संकीर्ण मनोभावों
से हो मुक्त
जीवन का विस्तार
कर ले
उम्र की रेख
कब मिट जायें
हाथ से
उससे पहले
कुछ नेक काम
कर ले।
यूँ भी वक्त
कम है
हर किसी के
पास में
बैठ गया इसमें भी
गर तू हार के
तो जिंदगी
शर्मिंदा होगी तेरे
नाम से।
डा.नीलम